अध्याय 13 बच्चे काम पर जा रहे हैं
राजेश जोशी
राजेश जोशी का जन्म संवत् 1946 में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में हुआ। उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद पत्रकारिता शुरू की और कुछ वर्षों तक अध्यापन भी किया। राजेश जोशी ने कविताओं के अलावा कहानियाँ, नाटक, लेख और टिप्पणियाँ भी लिखीं। साथ ही उन्होंने कुछ नाट्य रूपांतर भी किए हैं। कुछ लघु फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन का कार्य भी किया। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविताओं की अनुरचना ‘भूमिका कल्पतरु’ तथा मायाकोव्स्की की कविता का अनुवाद ‘पतलून पहले बादल’ नाम से किया है। कई भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेज़ी, रूसी और जर्मन में भी राजेश जी की कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। राजेश जोशी के प्रमुख काव्य-संग्रह हैं—‘एक दिन बोलेंगे पेड़’, ‘मिट्टी का चेहरा’, ‘नेपथ्य में हँसी’ और ‘दो पंक्तियों के बीच’। उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
राजेश जोशी की कविताएँ गहरे सामाजिक अभिप्राय वाली होती हैं। वे जीवन के संकट में भी गहरी आस्था को उभारती हैं। उनकी कविताओं में स्थानीय बोली-बानी, मिज़ाज और मौसम सब कुछ व्याप्त है। उनके काव्यलोक में आत्मीयता और लयात्मकता है तथा मानवता को बचाए रखने का एक निरंतर संघर्ष भी। दुनिया के नष्ट होने का खतरा राजेश जोशी को जितना प्रबल दिखाई देता है, उतना ही वे जीवन की संभावनाओं की खोज के लिए बेचैन दिखाई देते हैं।
प्रस्तुत कविता में बच्चों से बचपन छीन लिए जाने की पीड़ा व्यक्त हुई है। कवि ने उस सामाजिक-आर्थिक विडंबना की ओर इशारा किया है जिसमें कुछ बच्चे खेल, शिक्षा और जीवन की उमंग से वंचित हैं। कोहरे से ढकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं - सुबह-सुबह बच्चे काम पर जा रहे हैं। हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है: यह भयानक है, इसे विवरण की तरह लिखा जाना चाहिए, इसे सवाल की तरह - काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं? सारी गेंदें क्या दीमकों ने खा ली हैं? सारी रंग-बिरंगी किताबों को क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं? सारे खिलौने क्या किसी भूकंप में ढह गए हैं? सारे मदरसों की इमारतें, सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन खत्म हो गए हैं? एक-एक तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में? कितना भयानक होता—अगर ऐसा होता—भयानक है, लेकिन इससे भी ज़्यादा यह कि हज़ारों सड़कों से गुज़रते बच्चे, बहुत छोटे-छोटे बच्चे काम पर जा रहे हैं।
प्रश्न-अभ्यास
1. कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ने तथा विचार करने से आपके मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभरता है उसे लिखकर व्यक्त कीजिए।
२. कवि कामानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?’ कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए?
३. सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित क्यों हैं?
४. दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं?
५. आपने अपने शहर में बच्चों को कब-कब और कहाँ-कहाँ काम करते हुए देखा है?
६. बच्चों का काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है?
रचना और अभिव्यक्ति
७. काम पर जाते किसी बच्चे के स्थान पर अपने-आप को रखकर देखिए। आपको जो महसूस होता है उसे लिखिए।
८. आपके विचार से बच्चों को काम पर क्यों नहीं भेजा जाना चाहिए? उन्हें क्या करने के अवसर मिलने चाहिए?
पाठेतर सक्रियता - किसी कार्यरत बच्चे से संवाद कीजिए और पता लगाइए कि -
(क) वह अपने काम करने की बात को किस भाव से लेता/लेती है?
(ख) जब वह अपनी उम्र के बच्चों को खेलने/पढ़ने जाते देखता/देखती है तो कैसा महसूस करता/करती है?
‘वर्तमान युग में सभी बच्चों के लिए खेलकूद और शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हैं’ इस विषय पर वाद-विवाद आयोजित कीजिए।
‘बाल श्रम की रोकथाम’ पर नाटक तैयार कर उसकी प्रस्तुति कीजिए।
चंद्रकांत देवताले की कविता ‘थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे’ (लकड़बग्घा हँस रहा है) पढ़िए। उस कविता के भाव तथा प्रस्तुत कविता के भावों में क्या समान्य है?
कोहरा - धुंध
मदरसा - विद्यालय
हस्बमामूल - यथावत
यह भी जानें कि संविधान के अनुच्छेद 24 में कारखानों आदि में बालक/बालिकाओं के नियोजन के प्रतिषेध का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार ‘चौदह वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय नियोजन में नहीं लगाया जाएगा।’