अध्याय 01 दुःख का अधिकार

मनुष्यों की पोशाकें उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती हैं। प्रायः पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्ज़ा निश्चित करती है। वह हमारे लिए अनेक बंद दरवाज़े खोल देती है, परंतु कभी ऐसी भी परिस्थिति आ जाती है कि हम ज़रा नीचे झुककर समाज की निचली श्रेणियों की अनुभूति को समझना चाहते हैं। उस समय यह पोशाक ही बंधन और अड़चन बन जाती है। जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं, उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुकने से रोकती रहती है।

बाज़ार में, फुटपाथ पर कुछ खरबूजे डलियों में और कुछ ज़मीन पर बिक्री के लिए रखे जाते थे। खरबूजों के समीप एक अधेड़ उम्र की औरत बैठी रो रही थी। खरबूजे बिक्री के लिए थे, परंतु उन्हें खरीदने के लिए कोई कैसे आगे बढ़ता? खरबूजे बेचने वाली तो कपड़े से मुँह छिपाए सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफककर रो रही थी। पड़ोस की दुकानों के तख्तों पर बैठे या बाज़ार में खड़े लोग घृणा से उसी स्त्री के संबंध में बात कर रहे थे। उस स्त्री का रोना देखकर मन में एक व्यथा-सी उठी, पर उसके रोने का कारण जानने का उपाय क्या था? फुटपाथ पर उसके समीप बैठने में मेरी पोशाक ही व्यवधान बन खड़ी हो गई। एक आदमी ने घृणा से एक तरफ थूकते हुए कहा, “क्या ज़माना है! जवान लड़के को मरे पूरा दिन नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगाके बैठी है।” दूसरे साहब अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कह रहे थे, “अरे जैसी नीयत होती है अल्लाह भी वैसी ही बरकत देता है।”

सामने के फुटपाथ पर खड़े एक आदमी ने दिया सलाई की तीली से कान खुजाते हुए कहा, “अरे, इन लोगों का क्या है? ये कमीने लोग रोटी के टुकड़े पर जान देते हैं। इनके लिए बेटा-बेटी, खसम-लुगाई, धर्म-ईमान सब रोटी का टुकड़ा है।” परचून की दुकान पर बैठे लाला जी ने कहा, “अरे भाई, उनके लिए मरने-जीने का कोई मतलब न हो, पर दूसरे के धर्म-ईमान का तो खयाल करना चाहिए! जवान बेटे के मरने पर तेरह दिन का सूतक होता है और वह यहाँ सड़क पर बाज़ार में आकर खरबूजे बेचने बैठ गई है। हज़ार आदमी आते-जाते हैं। कोई क्या जानता है कि इसके घर में सूतक है। कोई इसके खरबूजे खा ले तो उसका ईमान-धर्म कैसे रहेगा? क्या अंधेर है!” पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर पता लगा - उसका तेईस बरस का जवान लड़का था। घर में उसकी बहू और पोता-पोती हैं। लड़का शहर के पास डेढ़ बीघा ज़मीन में कुछ तैयारी करके परिवार का निर्वाह करता था। खरबूजों की डलिया बाज़ार में पहुँचा कर कभी लड़का स्वयं सौदे के पास बैठ जाता, कभी माँ बैठ जाती।

लड़का सुबह-सुबह अँधेरे बेलों में से पके खरबूजे चुन रहा था। गीली मेड़की की तरह वट में विश्राम करते हुए एक साँप पर लड़के का पैर पड़ गया। साँप ने लड़के को डँस लिया। लड़के की बुढ़िया माँ बावली होकर ओझा को बुला लाई। झाड़-फूँक हुआ। नागदेव की पूजा हुई। पूजा के लिए दान-दक्षिणा चाहिए। घर में जो कुछ आटा और अनाज था, दान-दक्षिणा में उठ गया। माँ, बहू और बच्चे ‘भगवाना’ से लिपट-लिपटकर रोए, पर भगवाना जो एक दफे चुप हुआ तो फिर न बोला। सर्प के विष से उसका सारा बदन काला पड़ गया था। जिंदा आदमी नंगा भी रह सकता है, परंतु मुर्दे को नंगा कैसे विदा किया जाए? उसके लिए तो बजाज की दुकान से नया कपड़ा लाना ही होगा, चाहे उसके लिए माँ के हाथों के छन्नी-ककना ही क्यों न बिक जाएँ। भगवाना परलोक चला गया। घर में जो कुछ चूनी-भूसी थी सो उसे विदा करने में चली गई। बाप नहीं रहा तो क्या, लड़के सुबह उठते ही भूख से बिलबिलाने लगे। दादी ने उन्हें खाने के लिए खरबूजे दे दिए लेकिन बहू को क्या देती? बहू का बदन बुखार से तवे की तरह तप रहा था। अब बेटे के बिना बुढ़िया को दुअन्नी-चवन्नी भी कौन उधार देता।

बूढ़िया रोते-रोते और आँखें पोंछते-पोंछते भगवान के बटोरे हुए खरबूजे डलिया में समेटकर बाजार की ओर चली - और चारा भी क्या था? बूढ़िया खरबूजे बेचने का साहस करके आई थी, परंतु सिर पर चादर लपेटे, सिर को घुटनों पर टिकाए हुए फफक-फफककर रो रही थी। कल जिसका बेटा चल बसा, आज वह बाजार में सौदा बेचने चली है, हाय रे पत्थर-दिल! उस पुत्र-वियोगिनी के दुःख का अंदाज़ा लगाने के लिए पिछले साल अपने पड़ोस में पुत्र की मृत्यु से दुखी माता की बात सोचने लगा। वह संभ्रांत महिला पुत्र की मृत्यु के बाद अढ़ाई मास तक पलंग से उठ न सकी थी। उन्हें पंद्रह-पंद्रह मिनट बाद पुत्र-वियोग से मूर्छा आ जाती थी और मूर्छा न आने की अवस्था में आँखों से आँसू न रुकते थे। दो-दो डॉक्टर हरदम सिरहाने बैठे रहते थे। हरदम सिर पर बरफ रखी जाती थी। शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र-शोक से द्रवित हो उठे थे।

जब मन को सूझकारा स्तानहीं मिलता तो बेचैनी से कदम तेज़ हो जाते हैं। उसी हालत में नाक ऊपर उठाए, राह चलतों से ठोकरें खाता मैं चला जा रहा था। सोच रहा था - \ $ \qquad $ शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और… दुखी होने का भी एक अधिकार होता है। # # # प्रश्न-अभ्यास * * मौखिक * * * * निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए - * * * * 1 . * * किसी व्यक्ति की पोशाक को देखकर हमें क्या पता चलता है ? * * 2 . * * खरबूजे बेचने वाली स्त्री से कोई खरबूजे क्यों नहीं खरीद रहा था ? * * 3 . * * उस स्त्री को देखकर लेखक को कैसा लगा ? * * 4 . * * उस स्त्री के लड़के की मृत्यु का कारण क्या था ? * * 5 . * * बुढ़िया को कोई भी उधार क्यों नहीं देता ? * * लिखित * * * * ( क ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर ( 25 - 30 शब्दों में ) लिखिए - * * * * 1 . * * मनुष्य के जीवन में पोशाक का क्या महत्त्व है ? * * 2 . * * पोशाक हमारे लिए कब बंधन और अड़चन बन जाती है ? * * 3 . * * लेखक उस स्त्री के रोने का कारण क्यों नहीं जान पाया ? * * 4 . * * भगवान अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था ?

५. लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन बुड्ढी खरबूजे बेचने क्यों चल पड़ी?
६. बुड्ढी के दुःख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की संभ्रांत महिला की याद क्यों आई?

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (५०-६० शब्दों में) लिखिए:

१. बाज़ार के लोग खरबूजे बेचने वाली स्त्री के बारे में क्या-क्या कह रहे थे? अपने शब्दों में लिखिए।
२. पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को क्या पता चला?
३. लड़के को बचाने के लिए बुड्ढी माँ ने क्या-क्या उपाय किए?
४. लेखक ने बुड्ढी के दुःख का अंदाज़ा कैसे लगाया?
५. इस पाठ का शीर्षक ‘दुःख का अधिकार’ कहाँ तक सार्थक है? स्पष्ट कीजिए।

(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए:

१. जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं, उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुकने से रोकती रहती है।
२. इनके लिए बेटा-बेटी, खसम-लुगाई, धर्म-ईमान सब रोटी के टुकड़े हैं।
३. शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और… दुखी होने का भी एक अधिकार होता है।

भाषा-अध्ययन

1. निम्नांशित शब्द-समूहों को पढ़ो और समझो:

(क) कंघा, पतंग, चंचल, ठंडा, संबंध
(ख) कंघा, पतंग, चंचल, ठंडा, संबंध
(ग) अक्षुण्ण, सम्मिलित, दुर्ननी, चवन्नी, अन्न
(घ) संशय, संसद, संरचना, संवाद, संहार
(ङ) अँधेरा, बाँट, मुँह, ईंट, महिलाएँ, में, मैं

ध्यान दो कि ड़, ज़, ण़, ऩ और म़ ये पाँचों पंचमाक्षर कहलाते हैं। इनके लिखने की विधि ऊपर देखी है — इसी रूप में या अनुस्वार के रूप में। इन्हें दोनों में से किसी भी तरीके से लिखा जा सकता है और दोनों ही शुद्ध हैं। हाँ, एक पंचमाक्षर जब दो बार आए तो अनुस्वार का प्रयोग नहीं होगा; जैसे — अम्मा, अन्न आदि। इसी प्रकार इनके बाद यदि अंतस्थ य, र, ल, व और ऊष्म श, ष, स, ह आदि हों तो अनुस्वार का प्रयोग होगा, परंतु उसका उच्चारण पंचम वर्णों में से किसी एक वर्ण की भाँति हो सकता है; जैसे — संशय, संरचना में ‘न्’, संवाद में ‘म्’ और संहार में ‘ड्’।

(ं) यह चिह्न है अनुस्वार का और (ँ) यह चिह्न है अनुनासिक का। इन्हें क्रमशः बिंदु और चंद्र-बिंदु भी कहते हैं। दोनों के प्रयोग और उच्चारण में अंतर है। अनुस्वार का प्रयोग व्यंजन के साथ होता है, अनुनासिक का स्वर के साथ।

2. निम्नलिखित शब्दों के पर्याय लिखिए - ईमान $\qquad$……… बदन $\qquad$……… अंदाज़ा $\qquad$……… बेचैनी $\qquad$……… गम $\qquad$……… दर्ज़ा $\qquad$……… ज़मीन $\qquad$……… ज़माना $\qquad$……… बरकत $\qquad$………

3. निम्नलिखित उदाहरण के अनुसार पाठ में आए शब्द-युग्मों को छाँटकर लिखिए उदाहरण : बेटा-बेटी

4. पाठ के संदर्भ के अनुसार निम्नलिखित वाक्यांशों की व्याख्या कीजिए - बंद दरवाज़े खोल देना, निर्वाह करना, भूख से बिलबिलाना, कोई चारा न होना, शोक से द्रवित हो जाना।

5. निम्नलिखित शब्द-युग्मों और शब्द-समूहों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए -

(क) छन्नी-ककना ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ 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₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ 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| पोशाक | - | वस्त्र, पहनावा | | :— | :— | :— | | अनुरभा | - | एहसास | | अड़चन | - | विघ्न, रुकावट, बाधा | | अधेड़ | - | आधी उम्र का, ढलती उम्र का | | व्यथा | - | पीड़ा, दुःख | | धान | - | रुकावट, बाधा | | बेहया | - | बेशर्म, निर्लज्ज | | नीयत | - | इरादा, आशय | | बरकत | - | वृद्धि, लाभ, सौभाग्य | | खसम | - | पति | | लुगाई | - | पत्नी | | परचून की दुकान | - | आटा, चावल, दाल आदि की दुकान | | सूतक | - | परिवार में किसी बच्चे के जन्म होने या किसी के मरने पर कुछ निश्चित समय तक परिवार के लोगों को न छूना, छूत | | कछियारी | - | खेतों में तरकारियाँ बोना | | निर्वाह | - | गुज़ारा | | मेड़ | - | खेत के चारों ओर मिट्टी डालकर बनाया हुआ घेरा, दो खेतों के बीच की सीमा | | तरावट | - | गीला-पन, नमी, शीतलता, ठंडक | | ओझा | - | झाड़-फूंक करने वाला | | छन्नी-ककना | - | मामूली गहना, जेवर | | सहूलियत | - | सुविधा |