अध्याय 03 तुम कब जाओगे, अतिथि
आज तुम्हारे आगमन के चौथे दिवस पर यह प्रश्न बार-बार मन में घूम रहा है—तुम कब जाओगे, अतिथि? तुम जहाँ बैठे निस्संदेगी से सिगरेट का धुँआ फेंक रहे हो, उसके ठीक सामने एक कैलेंडर है। देख रहे हो न! इसकी तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से फड़फड़ाती रहती हैं। विगत दो दिनों से मैं तुम्हें दिखाकर तारीखें बदल रहा हूँ। तुम जानते हो, अगर तुम्हें हिसाब लगाना आता है कि यह चौथा दिन है, तुम्हारे सतत आतिथ्य का चौथा भारी दिन! पर तुम्हारे जाने की कोई संभावना प्रतीत नहीं होती। लाखों मील लंबी यात्रा करने के बाद वे दोनों ऐस्ट्रोनॉट्स भी इतने समय चाँद पर नहीं रुके थे, जितने समय तुम एक छोटी-सी यात्रा कर मेरे घर आए हो। तुम अपने भारी चरण-कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकित कर चुके, तुमने एक अंतरंग निजी संबंध मुझसे स्थापित कर लिया, तुमने मेरी आर्थिक सीमाओं की बैंजनी चट्टान देख ली; तुम मेरी कॉफी की मिट्टी खोद चुके। अब तुम लौट जाओ, अतिथि! तुम्हारे जाने के लिए यह उच्च समय अर्थात हाईटाइम है। क्या तुम्हें तुम्हारी पृथ्वी नहीं पुकारती?
उस दिन जब तुम आए थे, मेरा हृदय किसी अज्ञात आशा से धड़क उठा था। अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया। उसके बावजूद एक स्नेह-भीगी मुस्कराहट के साथ मैं तुमसे गले मिला और मेरी पत्नी ने तुम्हें सादर नमस्ते की। तुम्हारे सम्मान में, हमने रात के भोजन को एक उच्च-मध्यम वर्ग के डिनर में बदल दिया था। तुम्हें स्मरण होगा कि दो सब्जियों और रायते के अलावा हमने मिठाई भी बनाई थी। इस सारे उत्साह और लगन के मूल में एक आशा थी — आशा थी कि दूसरे दिन किसी रेल से एक शानदार यात्रा तुम्हारे हृदय में छाप छोड़ेगी और तुम चले जाओगे। हम तुमसे रुकने के लिए आग्रह करेंगे, मगर तुम नहीं मानोगे और एक अच्छे अतिथि की तरह चले जाओगे। पर ऐसा नहीं हुआ! दूसरे दिन भी तुम अपनी अतिथि-सुलभ मुस्कान लिए घर में ही बने रहे। हमने अपनी पीड़ा पी ली और प्रसन्न बने रहे। स्वागत-सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे, वहाँ से नीचे उतर कर हमने फिर दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रि को तुम्हें सिनेमा दिखाया। हमारे सत्कार का यह आखिरी छोर है, जिससे आगे हम किसी के लिए नहीं बढ़े। इसके तुरंत बाद भावभीनी विदाई का वह भीगा क्षण आ जाना चाहिए था, जब तुम विदा होते और हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाते। पर तुमने ऐसा नहीं किया।
तीसरे दिन की सुबह तुमने मुझसे कहा, “मैं धोबी को कपड़े देना चाहता हूँ।” यह आघात अप्रत्याशित था और इसकी चोट मार्मिक थी। तुम्हारे सामने प्यकी वेला एकाएक यों रबर की तरह खिंच जाएगी, इसका मुझे अनुमान न था। पहली बार मुझे लगा कि अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है। “किसी लॉन्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे।” मैंने कहा। मन-ही-मन एक विश्वास पल रहा था कि तुम्हें जल्दी जाना है। “कहाँ है लॉन्ड्री?” “चलो चलते हैं।” मैंने कहा और अपनी सहज बनियान पर औपचारिक कुर्ता डालने लगा। “कहाँ जा रहे हैं?” पत्नी ने पूछा। “इनके कपड़े लॉन्ड्री पर देने हैं।” मैंने कहा। मेरी पत्नी की आँखें एकाएक बड़ी-बड़ी हो गईं। आज से कुछ बरस पूर्व उनकी ऐसी आँखें देख मैंने अपने अकेलेपन की यात्रा समाप्त कर बिस्तर खोल दिया था। पर अब जब वही आँखें बड़ी होती हैं तो मन छोटा होने लगता है। वे इस आशंका और भय से बड़ी हुई थीं कि अतिथि अधिक दिनों ठहरेगा।
और आशा की निर्मल नहीं थी, अतिथि! तुम जाना नहीं रहे। लॉन्ड्री पर दिए कपड़े धुलकर आ गए और तुम यहीं हो। तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो। तुम्हें देखकर फूट पड़ने वाली मुस्कराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर अब लुप्त हो गई है। ठहाकों के रंगीन गुब्बारे, जो कल तक इस कमरे के आकाश में उड़ते थे, अब दिखाई नहीं पड़ते। बातचीत की उछलती हुई गेंद चर्चा के क्षेत्र के सभी कोनों से टप्पा खाकर फिर से सेंटर में आकर चुप पड़ी है। अब इसे न तुम हिला रहे हो, न मैं। कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो। शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए। परिवार, बच्चे, नौकरी, फिल्म, राजनीति, रिश्तेदारी, तबादले, पुराने दोस्त, परिवार-नियोजन, महँगाई, साहित्य और यहाँ तक कि आँख मार-मारकर हमने पुरानी प्रेमिकाओं का भी ज़िक्र कर लिया और अब एक चुप्पी है। सौ हार्द अब शनैः-शनैः बोरियत में रूपांतरित हो रहा है। भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही हैं, पर तुम जाना नहीं रहे। किसी अदृश्य गोंद से तुम्हारा व्यक्तित्व यहाँ चिपक गया है, मैं इस भेद को समझ नहीं पा रहा हूँ।
बार-बार यह प्रश्न उठ रहा है—तुम कब जाओगे, अतिथि? कल पत्नी ने धीरे से पूछा था, “कब तक टिकेंगे ये?” मैंने कंधे उचकाए, “क्या कह सकता हूँ!” “मैं तो आज खिचड़ी बना रही हूँ। हलकी रहेगी।” “बनाओ।” सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। डिनर से चले थे, खिचड़ी पर आ गए। अब भी अगर तुम अपने बिस्तर को गोलाकार रूप नहीं प्रदान करते तो हमें उपवास तक जाना होगा। तुम्हारे-मेरे संबंध एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं। तुम्हारे जाने का यह चरम क्षण है। तुम जाओ न अतिथि!
तुम्हें यहाँ अच्छा लग रहा है न! मैं जानता हूँ। दूसरों को यहाँ अच्छा लगता है। अगर बस चलता तो सभी लोग दूसरों के यहाँ रहते, पर ऐसा नहीं हो सकता। अपने घर की महत्ता के गीत इसी कारण गाए गए हैं। होम को इसी कारण स्वीट-होम कहा गया है कि लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़ें। तुम्हें यहाँ अच्छा लग रहा है, पर सोचो प्रिय, कि शराफत भी कोई चीज़ होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है, जो बोला जा सकता है।
अपने खर्राटों से एक और रात गुंजायमान करने के बाद कल जो किरण तुम्हारे बिस्तर पर आएगी, वह तुम्हारे यहाँ आगमन के बाद पाँचवीं सूर्य की परिचित किरण होगी। आशा है, वह तुम्हें चूमेगी और तुम घर लौटने का सम्मानपूर्ण निर्णय ले लोगे। मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी। उसके बाद मैं स्टैंड नहीं कर सकूँगा और लड़खड़ा जाऊँगा। मेरे अतिथि, मैं जानता हूँ कि अतिथि देवता होता है, पर आखिर मैं भी मनुष्य हूँ। मैं कोई तुम्हारी तरह देवता नहीं। एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते। देवता दर्शन देकर लौट जाता है। तुम लौट जाओ अतिथि! इसी में तुम्हारा देवत्व सुरक्षित रहेगा। यह मनुष्य अपनी वाली पर उतरे, उसके पूर्व तुम लौट जाओ! उफ़, तुम कब जाओगे, अतिथि?
प्रश्न-अभ्यास
मौखिक
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए
1. अतिथि कितने दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है?
2. कैलेंडर की तारीखें किस तरह फड़फड़ा रही हैं?
3. पति-पत्नी ने महमान का स्वागत कैसे किया?
4. दोपहर के भोजन को कौन-सी गरिमा प्रदान की गई?
5. तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा?
६. सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ?
लिखित
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए -
१. लेखक अतिथि को कैसी विदाई देना चाहता था?
२. पाठ में आए निम्नलिखित कथनों की व्याख्या कीजिए -
(क) अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया।
(ख) अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े-से अंशों में राक्षस भी हो सकता है।
(ग) लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़ें।
(घ) मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सीमा होगी।
(ङ) एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते।
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए -
१. कौन-सा आघात अप्रत्याशित था और उसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?
२. ‘संबंधों का संक्रमण के दौर से गुज़रना’ - इस पंक्ति से आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
३. जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए?
भाषा-अध्ययन
१. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए -
चाँद, ज़िक्र, आघात, ऊष्मा, अंतरंग
२. निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए -
(क) हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाएँगे। (नकारात्मक वाक्य) (ख) किसी लॉन्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे। (प्रश्नवाचक वाक्य) (ग) सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। (भविष्यत्काल) (घ) इनके कपड़े देने हैं। (स्थानसूचक प्रश्नवाची) (ङ) कब तक टिकेंगे ये? (नकारात्मक)
3. पाठ में आए इन वाक्यों में ‘चुकना’ क्रिया के विभिन्न प्रयोगों को ध्यान से देखिए और वाक्य संरचना को समझिए -
(क) तुम अपने भारी चरण-कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकित कर चुके। (ख) तुम मेरी काफ़ी मिट्टी खोद चुके। (ग) आदर-सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे। (घ) शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए। (ङ) तुम्हारे भारी-भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो।
4. निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं में ‘तुम’ के प्रयोग पर ध्यान दीजिए -
(क) लॉन्ड्री पर दिए कपड़े धुलकर आ गए और तुम यहीं हो। (ख) तुम्हें देखकर फूट पड़ने वाली मुस्कुराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर अब लुप्त हो गई है। (ग) तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी।
(घ) कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो। (ङ) भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही हैं, पर तुम जान नहीं रहे।
योग्यता-विस्तार
1. ‘अतिथि देवो भव’ उक्ति की व्याख्या करें तथा आधुनिक युग के संदर्भ में इसका आकलन करें।
2. विद्यार्थी अपने घर आए अतिथियों के सत्कार का अनुभव कक्षा में सुनाएँ।
3. अतिथि के अपेक्षा से अधिक रुक जाने पर लेखक की क्या-क्या प्रतिक्रियाएँ हुईं, उन्हें क्रम से छांटकर लिखिए।
शब्दार्थ और टिप्पणियाँ
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आगमन - आना निस्संकोच - संकोचरहित, बिना संकोच के नम्रता - नत होने का भाव, स्वभाव में नरमी का होना सतत - निरंतर, लगातार आतिथ्य - आवभगत एस्ट्रॉनॉट्स - अंतरिक्ष यात्री अंतरंग - घनिष्ठ, गहरा आशंका - खतरा, भय, डर मेहमाननवाज़ी - अतिथि सत्कार छोर - किनारा, सीमा भावभीनी - प्रेम से ओतप्रोत आघात - चोट, प्रहार अप्रत्याशित - आकस्मिक, अनसोचा मार्मिक - मर्मस्पर्शी सामीप्य - निकटता, समीपता औपचारिक - दिखावटी, रस्मी निर्मूल - मूलरहित, बिना जड़ का कोनलों - कोनों से सौहार्द - मैत्री, हृदय की सरलता रूपांतरित - जिसका रूप (आकार) बदल दिया गया हो ऊष्मा - गरमी, उग्रता संक्रमण - एक स्थिति या अवस्था से दूसरी में प्रवेश गुंजायमान - गूँजता हुआ