अध्याय 03 जय शंकर प्रसाद

जय शंकर प्रसाद

सन् 1889-1937

जय शंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 में वाराणसी में हुआ। काशी के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज में वे पढ़ने गए परंतु स्थितियाँ अनुकूल न होने के कारण आठवीं से आगे नहीं पढ़ पाए। बाद में घर पर ही संस्कृत, हिंदी, फ़ारसी का अध्ययन किया। छायावादी काव्य प्रवृत्ति के प्रमुख कवियों में से एक जयशंकर प्रसाद का सन् 1937 में निधन हो गया।

उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं-चित्राधार, कानन-कुसुम, झरना, आँसू, लहर और कामायनी। आधुनिक हिंदी की श्रेष्ठतम काव्य-कृति मानी जाने वाली कामायनी पर उन्हें मंगलाप्रसाद् पारितोषिक दिया गया। वे कवि के साथ-साथ सफल गद्यकार भी थे। अजातशत्रु, चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और ध्रुवस्वामिनी उनके नाटक हैं तो कंकाल, तितली और इरावती उपन्यास। आकाशदीप, आँधी और इंद्रजाल उनके कहानी संग्रह हैं।

प्रसाद का साहित्य जीवन की कोमलता, माधुर्य, शक्ति और ओज का साहित्य माना जाता है। छायावादी कविता की अतिशय काल्पनिकता, सौंदर्य का सूक्ष्म चित्रण, प्रकृति-प्रेम, देश-प्रेम और शैली की लाक्षणिकता उनकी कविता की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इतिहास और दर्शन में उनकी गहरी रुचि थी जो उनके साहित्य में स्पष्ट दिखाई देती है।


प्रेमचंद के संपादन में हंस (पत्रिका) का एक आत्मकथा विशेषांक निकलना तय हुआ था। प्रसाद जी के मित्रों ने आग्रह किया कि वे भी आत्मकथा लिखें। प्रसाद जी इससे सहमत न थे। इसी असहमति के तर्क से पैदा हुई कविता है-आत्मकथ्य। यह कविता पहली बार 1932 में हंस के आत्मकथा विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। छायावादी शैली में लिखी गई इस कविता में जयशंकर प्रसाद ने जीवन के यथार्थ एवं अभाव पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। छायावादी सूक्ष्मता के अनुरूप ही अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करने के लिए जयशंकर प्रसाद ने ललित, सुंदर एवं नवीन शब्दों और बिंबों का प्रयोग किया है। इन्हीं शब्दों एवं बिंबों के सहारे उन्होंने बताया है कि उनके जीवन की कथा एक सामान्य व्यक्ति के जीवन की कथा है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे महान और रोचक मानकर लोग वाह-वाह करेंगे। कुल मिलाकर इस कविता में एक तरफ कवि द्वारा यथार्थ की स्वीकृति है तो दूसरी तरफ़ एक महान कवि की विनम्रता भी।


आत्मकथ्य

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मधुमक्खी गुनगुनाते हुए पूछती जाती है—कौन सुनाएगा अपनी यह कहानी?

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
देखो, आज कितनी अधिक संख्या में पत्तियाँ मुरझाकर गिर रही हैं।

इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास
इस गंभीर, अनंत नीले आकाश में असंख्य जीवनों के इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास
देखो, ये सदा अपना व्यंग्य से भरा, मलिन उपहास करते रहते हैं

तब भी कहते हो—कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
फिर भी तुम कहते हो—कि मैं अपनी बीती हुई दुर्बलता कह दूँ?

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे—यह गागर रीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे—यह गागर (बात) रीति बन गई है।

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले—
पर कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले बन जाओ—

अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
अपने को समझो, मेरा रस लेकर अपने को भरने वाले।

यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।
यह विडंबना है! हे सरलता, मैं तेरी हँसी उड़ाऊँ?

भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।
क्या मैं अपनी भूलें छिपाकर औरों की प्रवंचना दिखाऊँ?

उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
मैं उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, उन मधुर चाँदनी रातों की?

अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।
अरे, जो खिलखिलाकर हँसने वाली उन बातों की।

मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
वह सुख मिला ही कहाँ, जिसका सपना देखकर मैं जाग गया था।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
गले लगते-लगते जो मुस्कुराकर भाग गया।

जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
जिसके लालिमा लिए हुए गालों की मदहोश सुंदर छाया में

अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
प्रेम करने वाली उषा (सवेरे की बेला) अपना सुहाग मधुमय छाया में लेती थी।

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
उसकी स्मृति थके हुए पथिक की यात्रा का पाथेय बन गई है।

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
तुम मेरी कंथा की सिलाई क्यों खोलकर देखना चाहते हो?

छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
छोटे से जीवन की बड़ी-बड़ी कथाएँ मैं आज कैसे कहूँ?

क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
क्या यह बेहतर नहीं कि मैं दूसरों की बातें सुनता रहूँ और चुप रहूँ?

सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
मेरी भोली आत्म-कथा सुनकर तुम क्या भला करोगे?

अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
अभी समय भी नहीं है, मेरी मौन व्यथा थककर सो रही है।

(ख) जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
जिसके लाल गालों की मदहोश सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
प्रेम भरी भोर अपने सुहाग को मधुर माया में लेती थी।

5. ‘उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की’-कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
5. ‘उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की’-कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

6. ‘आत्मकथ्य’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।
6. ‘आत्मकथ्य’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।

7. कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था, उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?
7. कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था, उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?

रचना और अभिव्यक्ति

रचना और अभिव्यक्ति

8. इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व की जो झलक मिलती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
8. इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व की जो झलक मिलती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।

9. आप किन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे और क्यों?
9. आप किन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे और क्यों?

10. कोई भी अपनी आत्मकथा लिख सकता है। उसके लिए विशिष्ट या बड़ा होना ज़रूरी नहीं। हरियाणा राज्य के गुड़गाँव में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली बेबी हालदार की आत्मकथा “आलो आंधारि” बहुतों के द्वारा सराही गई। आत्मकथात्मक शैली में अपने बारे में कुछ लिखिए।
10. कोई भी अपनी आत्मकथा लिख सकता है। उसके लिए विशिष्ट या बड़ा होना ज़रूरी नहीं। हरियाणा राज्य के गुड़गाँव में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली बेबी हालदार की आत्मकथा “आलो आंधारि” बहुतों के द्वारा सराही गई। आत्मकथात्मक शैली में अपने बारे में कुछ लिखिए।

पाठेतर सक्रियता

पाठेतर सक्रियता

  • किसी भी चर्चित व्यक्ति का अपनी निजता को सार्वजनिक करना या दूसरों का उनसे ऐसी अपेक्षा करना सही है-इस विषय के पक्ष-विपक्ष में कक्षा में चर्चा कीजिए।

  • किसी भी चर्चित व्यक्ति का अपनी निजता को सार्वजनिक करना या दूसरों का उनसे ऐसी अपेक्षा करना सही है-इस विषय के पक्ष-विपक्ष में कक्षा में चर्चा कीजिए।

  • बिना ईमानदारी और साहस के आत्मकथा नहीं लिखी जा सकती। गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़कर पता लगाइए कि उसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं?

  • बिना ईमानदारी और साहस के आत्मकथा नहीं लिखी जा सकती। गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़कर पता लगाइए कि उसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं?

शब्द-संपदा

शब्द-संपदा

मधुप - मन रूपी भौंरा
मधुप - मन रूपी भौंरा
अनंत नीलिमा - अंतहीन विस्तार
अनंत नीलिमा - अंतहीन विस्तार
व्यंग्य मलिन - खराब ढंग से निंदा करना
व्यंग्य मलिन - खराब ढंग से निंदा करना
गागर-रीती - ऐसा मन जिसमें कोई भाव नहीं, खाली घड़ा
गागर-रीती - ऐसा मन जिसमें कोई भाव नहीं, खाली घड़ा
प्रवंचना - धोखा
प्रवंचना - धोखा
मुसक्या कर - मुसकराकर
मुसक्या कर - मुसकराकर
अरुण-कोपल - लाल गाल
अरुण-कोपल - लाल गाल
अनुरागिनी उषा - प्रेम भरी भोर
अनुरागिनी उषा - प्रेम भरी भोर
स्मृति पाथेय - स्मृति रूपी संबल
स्मृति पाथेय - स्मृति रूपी संबल
पंथा - रास्ता, राह
पंथा - रास्ता, राह
कंथा - अंतर्मन, गुदड़ी
कंथा - अंतर्मन, गुदड़ी

यह भी जानें

यह भी जानें

  • प्रगतिशील चेतना की साहित्यिक मासिक पत्रिका हंस प्रेमचंद ने सन् 1930 से 1936 तक निकाली थी। पुन: सन् 1986 से यह साहित्यिक पत्रिका निकल रही है और इसके संपादक राजेंद्र यादव हैं।

  • बनारसीदास जैन कृत अर्धकथानक हिंदी की पहली आत्मकथा मानी जाती है। इसकी रचना सन् 1641 में हुई और यह पद्यात्मक है।

आत्मकथ्य का एक अन्य रूप यह भी देखें-

मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!
मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

-कवि बच्चन की आत्म-परिचय कविता का अंश