अध्याय 08 बालगोबिन भगत
रामवृक्ष बेनीपुरी
सन् 1899-1968
रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के मुजफ़्फ़रपुर ज़िले के बेनीपुर गाँव में सन् 1899 में हुआ। माता-पिता का निधन बचपन में ही हो जाने के कारण जीवन के आरंभिक वर्ष अभावों-कठिनाइयों और संघर्षों में बीते। दसवीं तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे सन् 1920 में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए। कई बार जेल भी गए। उनका देहावसान सन् 1968 में हुआ।
15 वर्ष की अवस्था में बेनीपुरी जी की रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। वे बेहद प्रतिभाशाली पत्रकार थे। उन्होंने अनेक दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनमें तरुण भारत, किसान मित्र, बालक, युवक, योगी, जनता, जनवाणी और नयी धारा उल्लेखनीय हैं।
गद्य की विविध विधाओं में उनके लेखन को व्यापक प्रतिष्ठा मिली। उनका पूरा साहित्य बेनीपुरी रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित है। उनकी रचना-यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव हैं-पतितों के देश में (उपन्यास); चिता के फूल (कहानी); अंबपाली (नाटक); माटी की मूरतें (रेखाचित्र); पैरों में पंख बाँधकर (यात्रा-वृत्तांत); ज़ंजीरें और दीवारें (संस्मरण) आदि। उनकी रचनाओं में स्वाधीनता की चेतना, मनुष्यता की चिंता और इतिहास की युगानुरूप व्याख्या है। विशिष्ट शैलीकार होने के कारण उन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है।
बालगोबिन भगत रेखाचित्र के माध्यम से लेखक ने एक ऐसे विलक्षण चरित्र का उद्घाटन किया है जो मनुष्यता, लोक संस्कृति और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। वेशभूषा या बाह्य अनुष्ठानों से कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास का आधार जीवन के मानवीय सरोकार होते हैं। बालगोबिन भगत इसी आधार पर लेखक को संन्यासी लगते हैं। यह पाठ सामाजिक रूढ़ियों पर भी प्रहार करता है। इस रेखाचित्र की एक विशेषता यह है कि बालगोबिन भगत के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी देखने को मिलती है।
बालगोबिन भगत
बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी थे। साठ से ऊपर के ही होंगे। बाल पक गए थे। लंबी दाढ़ी या जटाजूट तो नहीं रखते थे, किंतु हमेशा उनका चेहरा सफ़ेद बालों से ही जगमग किए रहता। कपड़े बिलकुल कम पहनते। कमर में एक लंगोटी-मात्र और सिर में कबीरपंथियों की-सी कनफटी टोपी। जब जाड़ा आता, एक काली कमली ऊपर से ओढ़े रहते। मस्तक पर हमेशा चमकता हुआ रामानंदी चंदन, जो नाक के एक छोर से ही, औरतों के टीके की तरह, शुरू होता। गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला बाँधे रहते।
ऊपर की तसवीर से यह नहीं माना जाए कि बालगोबिन भगत साधु थे। नहीं, बिलकुल गृहस्थ! उनकी गृहिणी की तो मुझे याद नहीं, उनके बेटे और पतोहू को तो मैंने देखा था। थोड़ी खेतीबारी भी थी, एक अच्छा सा�फ़-सुथरा मकान भी था।
लेकिन, खेती करते हुए भी, परिवार पालते हुए भी, बालगोबिन भगत साधु थे—साधु की हर परिभाषा पर खरे उतरने वाले। कबीर को ‘साहब’ मानते थे, उन्हीं के गीत गाते, उन्हीं के आदेशों पर चलते। कभी झूठ नहीं बोलते, साफ़-सुथरा व्यवहार रखते। किसी से भी सीधी बात करने में हिचकिचाते नहीं, न किसी से बिना वजह झगड़ा मोल लेते। किसी की चीज़ नहीं छूते, न बिना पूछे इस्तेमाल करते। इस नियम को कभी-कभी इतनी बारीकी तक ले जाते कि लोगों को आश्चर्य होता!—कभी वे दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते! वे गृहस्थ थे; लेकिन उनकी हर चीज़ ‘साहब’ की थी। जो कुछ खेत में उगता, सिर पर लादकर पहले उसे साहब के दरबार में ले जाते—जो उनके घर से चार कोस दूर था—एक कबीरपंथी मठ में! वहाँ ‘भेंट’ के रूप में चढ़ाकर ‘प्रसाद’ के रूप में जो कुछ मिलता, उसे घर लाते और उसी से गुज़ारा करते!
इन सबसे ऊपर, मैं तो मुग्ध था उनके मधुर गाने पर—जो हमेशा सुनने को मिलते। कबीर के वे सीधे-सादे पद, जो उनके कंठ से निकलकर जीवंत हो उठते।
आसाढ़ की रिमझिम बरस रही है। पूरा गाँव खेतों में उतर आया है। कहीं हल चल रहे हैं; कहीं रोपाई हो रही है। धान के पानी-भरे खेतों में बच्चे कूद रहे हैं। औरतें खाना लेकर मेंड़
पर बैठी हैं। आसमान बादल से घिरा; धूप का नाम नहीं। ठंडी पुरवाई चल रही। ऐसे ही समय आपके कानों में एक स्वर-तरंग झंकार-सी कर उठी। यह क्या है-यह कौन है! यह पूछना न पड़ेगा। बालगोबिन भगत समूचा शरीर कीचड़ में लिथड़े, अपने खेत में रोपनी कर रहे हैं। उनकी अँगुली एक-एक धान के पौधे को, पंक्तिबद्ध, खेत में बिठा रही है। उनका कंठ एक-एक शब्द को संगीत के जीने पर चढ़ाकर कुछ को ऊपर, स्वर्ग की ओर भेज रहा है और कुछ को इस पृथ्वी की मिट्टी पर खड़े लोगों के कानों की ओर! बच्चे खेलते हुए झूम उठते हैं; मेंड़ पर खड़ी औरतों के होंठ काँप उठते हैं, वे गुनगुनाने लगती हैं; हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते हैं; रोपनी करनेवालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम से चलने लगती हैं! बालगोबिन भगत का यह संगीत है या जादू!
भादो की वह अँधेरी अधरतिया। अभी, थोड़ी ही देर पहले मुसलधार वर्षा खत्म हुई है। बादलों की गरज, बिजली की तड़प में आपने कुछ नहीं सुना हो, किंतु अब झिल्ली की झंकार या दादुरों की टर्र-टर्र बालगोबिन भगत के संगीत को अपने कोलाहल में डुबो नहीं सकतीं। उनकी खँजड़ी डिमक-डिमक बज रही है और वे गा रहे हैं-“गोदी में पियवा, चमक
“उठे सखिया, चिहुँक उठे ना!” हाँ, पिया तो गोद में ही है, किंतु वह समझती है, वह अकेली है, चमक उठती है, चिहुँक उठती है। उसी भरे-बादलों वाले भादो की आधी रात में उनका यह गाना अँधेरे में अकस्मात कौंध उठने वाली बिजली की तरह किसे न चौंका देता? अरे, अब सारा संसार निस्तब्धता में सोया है, बालगोबिन भगत का संगीत जाग रहा है, जगा रहा है!-तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफ़िर जाग ज़रा!
कातिक आया नहीं कि बालगोबिन भगत की प्रभातियाँ शुरू हुईं, जो फागुन तक चला करतीं। इन दिनों वह सबेरे ही उठते। न जाने किस वक्त जगकर वह नदी-स्नान को जाते-गाँव से दो मील दूर! वहाँ से नहा-धोकर लौटते और गाँव के बाहर ही, पोखरे के ऊँचे भिंडे पर, अपनी खँजड़ी लेकर जा बैठते और अपने गाने टेरने लगते। मैं शुरू से ही देर तक सोनेवाला हूँ, किंतु, एक दिन, माघ की उस दाँत किटकिटानेवाली भोर में भी, उनका संगीत मुझे पोखरे पर ले गया था। अभी आसमान के तारों के दीपक बुझे नहीं थे। हाँ, पूरब में लोही लग गई थी जिसकी लालिमा को शुक्र तारा और बढ़ा रहा था। खेत, बगीचा, घर-सब पर कुहासा छा रहा था। सारा वातावरण अजीब रहस्य से आवृत मालूम पड़ता था। उस रहस्यमय वातावरण में एक कुश की चटाई पर पूरब मुँह, काली कमली ओढ़े, बालगोबिन भगत अपनी खँजड़ी लिए बैठे थे। उनके मुँह से शब्दों का ताँता लगा था, उनकी अँगुलियाँ खँजड़ी पर लगातार चल रही थीं। गाते-गाते इतने मस्त हो जाते, इतने सुरूर में आते, उत्तेजित हो उठते कि मालूम होता, अब खड़े हो जाएँगे। कमली तो बार-बार सिर से नीचे सरक जाती। मैं जाड़े से कँपकँपा रहा था, किंतु तारे की छाँव में भी उनके मस्तक के श्रमबिंदु, जब-तब, चमक ही पड़ते।
गर्मियों में उनकी ‘संझा’ कितनी उमसभरी शाम को न शीतल करती!
गर्मियों में उनकी ‘संझा’ कितनी उमसभरी शाम को ठंडक नहीं देती थी!
अपने घर के आँगन में आसन जमा बैठते।
वे अपने घर के आँगन में बैठ जाते थे।
गाँव के उनके कुछ प्रेमी भी जुट जाते।
गाँव के उनके कुछ प्रेमी भी इकट्ठा हो जाते थे।
खँजडड़ियों और करतालों की भरमार हो जाती।
खँजड़ियों और करतालों की भरमार हो जाती थी।
एक पद बालगोबिन भगत कह जाते, उनकी प्रेमी-मंडली उसे दुहराती, तिहराती।
एक पद बालगोबिन भगत गाते, उनकी प्रेमी-मंडली उसे दोहराती, तिहराती।
धीरे-धीरे स्वर ऊँचा होने लगता-एक निश्चित ताल, एक निश्चित गति से।
धीरे-धीरे स्वर ऊँचा होने लगता-एक निश्चित ताल, एक निश्चित गति से।
उस ताल-स्वर के चढ़ाव के साथ श्रोताओं के मन भी ऊपर उठने लगते।
उस ताल-स्वर के चढ़ाव के साथ श्रोताओं के मन भी ऊपर उठने लगते।
धीरे-धीरे मन तन पर हावी हो जाता।
धीरे-धीरे मन शरीर पर हावी हो जाता।
होते-होते, एक क्षण ऐसा आता कि बीच में खँजड़ी लिए बालगोबिन भगत नाच रहे हैं और उनके साथ ही सबके तन और मन नृत्यशील हो उठे हैं।
होते-होते, एक क्षण ऐसा आता कि बीच में खँजड़ी लिए बालगोबिन भगत नाच रहे होते हैं और उनके साथ ही सबके तन और मन नृत्यशील हो उठते हैं।
सारा आँगन नृत्य और संगीत से ओतप्रोत है!
सारा आँगन नृत्य और संगीत से भरा हुआ है!
बालगोबिन भगत की संगीत-साधना का चरम उत्कर्ष उस दिन देखा गया जिस दिन उनका बेटा मरा।
बालगोबिन भगत की संगीत-साधना का चरम उत्कर्ष उस दिन देखा गया जिस दिन उनका बेटा मरा।
इकलौता बेटा था वह!
वह इकलौता बेटा था!
कुछ सुस्त और बोदा-सा था, किंतु इसी कारण बालगोबिन भगत उसे और भी मानते।
वह थोड़ा सुस्त और बोदा-सा था, लेकिन इसी कारण बालगोबिन भगत उसे और भी मानते थे।
उनकी समझ में ऐसे आदमियों पर ही ज़्यादा नज़र रखनी चाहिए या प्यार करना चाहिए, क्योंकि ये निगरानी और मुहब्बत के ज़्यादा हकदार होते हैं।
उनकी समझ में ऐसे आदमियों पर ही ज़्यादा नज़र रखनी चाहिए या प्यार करना चाहिए, क्योंकि ये निगरानी और मुहब्बत के ज़्यादा हकदार होते हैं।
बड़ी साध से उसकी शादी कराई थी, पतोटू बड़ी ही सुभग और सुशील मिली थी।
बड़ी साध से उसकी शादी कराई थी, पतोटू बड़ी ही सुभग और सुशील मिली थी।
घर की पूरी प्रबंधिका बनकर भगत को बहुत कुछ दुनियादारी से निवृत्त कर दिया था उसने।
घर की पूरी प्रबंधिका बनकर भगत को बहुत कुछ दुनियादारी से निवृत्त कर दिया था उसने।
उनका बेटा बीमार है, इसकी खबर रखने की लोगों को कहाँ फ़ुरसत!
उनका बेटा बीमार है, इसकी खबर रखने की लोगों को कहाँ फ़ुरसत!
किंतु मौत तो अपनी ओर सबका ध्यान खींचकर ही रहती है।
लेकिन मौत तो अपनी ओर सबका ध्यान खींचकर ही रहती है।
हमने सुना, बालगोबिन भगत का बेटा मर गया।
हमने सुना, बालगोबिन भगत का बेटा मर गया।
कुतूहलवश उनके घर गया।
कुतूहलवश उनके घर गया।
देखकर दंग रह गया।
देखकर दंग रह गया।
बेटे को आँगन में एक चटाई पर लिटाकर एक सफ़ेद कपड़े से ढाँक रखा है।
बेटे को आँगन में एक चटाई पर लिटाकर एक सफ़ेद कपड़े से ढाँक रखा है।
वह कुछ फूल तो हमेशा ही रोपते रहते, उन फूलों में से कुछ तोड़कर उस पर बिखरा दिए हैं; फूल और तुलसीदल भी।
वह कुछ फूल तो हमेशा ही रोपते रहते, उन फूलों में से कुछ तोड़कर उस पर बिखरा दिए हैं; फूल और तुलसीदल भी।
सिरहाने एक चिराग जला
सिरहाने एक चिराग जला
रखा है। और, उसके सामने ज़मीन पर ही आसन जमाए गीत गाए चले जा रहे हैं! वही पुराना स्वर, वही पुरानी तल्लीनता। घर में पतोहू रो रही है जिसे गाँव की स्त्रियाँ चुप कराने की कोशिश कर रही हैं। किंतु, बालगोबिन भगत गाए जा रहे हैं! हाँ, गाते-गाते कभी-कभी पतोहू के नज़दीक भी जाते और उसे रोने के बदले उत्सव मनाने को कहते। आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहिनी अपने प्रेमी से जा मिली, भला इससे बढ़कर आनंद की कौन बात? मैं कभी-कभी सोचता, यह पागल तो नहीं हो गए। किंतु नहीं, वह जो कुछ कह रहे थे उसमें उनका विश्वास बोल रहा था-वह चरम विश्वास जो हमेशा ही मृत्यु पर विजयी होता आया है।
बेटे के क्रिया-कर्म में तूल नहीं किया; पतोहू से ही आग दिलाई उसकी। किंतु ज्योंही श्राद्ध की अवधि पूरी हो गई, पतोहू के भाई को बुलाकर उसके साथ कर दिया, यह आदेश देते हुए कि इसकी दूसरी शादी कर देना। इधर पतोहू रो-रोकर कहती-मैं चली जाऊँगी तो बुढ़ापे में कौन आपके लिए भोजन बनाएगा, बीमार पड़े, तो कौन एक चुल्लू पानी भी देगा? मैं पैर पड़ती हूँ, मुझे अपने चरणों से अलग नहीं कीजिए! लेकिन भगत का निर्णय अटल था। तू जा, नहीं तो मैं ही इस घर को छोड़कर चल दूँगा-यह थी उनकी आखिरी दलील और इस दलील के आगे बेचारी की क्या चलती?
बालगोबिन भगत की मौत उन्हीं के अनुरूप हुई।
बालगोबिन भगत की मृत्यु उन्हीं के अनुरूप हुई।
वह हर वर्ष गंगा-स्नान करने जाते।
वे हर वर्ष गंगा-स्नान करने जाते थे।
स्नान पर उतनी आस्था नहीं रखते, जितना संत-समागम और लोक-दर्शन पर।
स्नान पर उतनी आस्था नहीं थी, जितनी संत-समागम और लोक-दर्शन पर।
पैदल ही जाते।
वे पैदल ही जाते थे।
करीब तीस कोस पर गंगा थी।
गंगा करीब तीस कोस दूर थी।
साधु को संबल लेने का क्या हक?
साधु को संबल लेने का क्या अधिकार है?
और, गृहस्थ किसी से भिक्षा क्यों माँगे?
और, गृहस्थ किसी से भीख क्यों माँगे?
अतः, घर से खाकर चलते, तो फिर घर पर ही लौटकर खाते।
इसलिए, वे घर से खाकर चलते, फिर घर लौटकर ही खाते।
रास्ते भर खँजड़ी बजाते, गाते जहाँ प्यास लगती, पानी पी लेते।
रास्ते भर वे खँजड़ी बजाते, गाते और जहाँ प्यास लगती, वहीं पानी पी लेते।
चार-पाँच दिन आने-जाने में लगते; किंतु इस लंबे उपवास में भी वही मस्ती!
आने-जाने में चार-पाँच दिन लगते; लेकिन इस लंबे उपवास में भी वही मस्ती!
अब बुढ़ापा आ गया था, किंतु टेक वही जवानीवाली।
अब बुढ़ापा आ गया था, लेकिन झुकाव वही जवानी वाला था।
इस बार लौटे तो तबीयत कुछ सुस्त थी।
इस बार जब लौटे, तो तबीयत कुछ सुस्त थी।
खाने-पीने के बाद भी तबीयत नहीं सुधरी, थोड़ा बुखार आने लगा।
खाने-पीने के बाद भी तबीयत नहीं सुधरी, थोड़ा बुखार आने लगा।
किंतु नेम-व्रत तो छोड़नेवाले नहीं थे।
लेकिन वे नेम-व्रत छोड़ने वाले नहीं थे।
वही दोनों जून गीत, स्नानध्यान, खेतीबारी देखना।
वही दोनों जून गीत, स्नान-ध्यान, खेतीबारी देखना।
दिन-दिन छीजने लगे।
दिन-ब-दिन वे छीजने लगे।
लोगों ने नहाने-धोने से मना किया, आराम करने को कहा।
लोगों ने उन्हें नहाने-धोने से मना किया, आराम करने को कहा।
किंतु, हँसकर टाल देते रहे।
लेकिन वे हँसकर टाल देते रहे।
उस दिन भी संध्या में गीत गाए, किंतु मालूम होता जैसे तागा टूट गया हो, माला का एक-एक दाना बिखरा हुआ।
उस दिन भी संध्या में गीत गाया, लेकिन ऐसा लगा जैसे तागा टूट गया हो, माला का एक-एक दाना बिखरा हुआ।
भोर में लोगों ने गीत नहीं सुना, जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे सिर्फ़ उनका पंजर पड़ा है!
भोर में लोगों ने गीत नहीं सुना, जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे — सिर्फ़ उनका पंजर पड़ा था!
प्रश्न-अभ्यास
1. खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?
1. खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?
2. भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?
2. भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?
3. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस तरह व्यक्त कीं?
3. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस तरह व्यक्त कीं?
4. भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए।
4. भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए।
5. बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी?
5. बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी?
6. पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए।
6. पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए।
7. कुछ मार्मिक प्रसंगों के आधार पर यह दिखाई देता है कि बालगोबिन भगत प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे। पाठ के आधार पर उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।
8. धान की रोपाई के समय समूचे माहौल को भगत की स्वर लहरियाँ किस तरह चमत्कृत कर देती थीं? उस माहौल का शब्द-चित्र प्रस्तुत कीजिए।
रचना और अभिव्यक्ति
9. पाठ के आधार पर बताएँ कि बालगोबिन भगत की कबीर पर श्रद्धा किन-किन रूपों में प्रकट हुई है?
10. आपकी दृष्टि में भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के क्या कारण रहे होंगे?
11. गाँव का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश आषाढ़ चढ़ते ही उल्लास से क्यों भर जाता है?
12. “ऊपर की तसवीर से यह नहीं माना जाए कि बालगोबिन भगत साधु थे।” क्या ‘साधु’ की पहचान पहनावे के आधार पर की जानी चाहिए? आप किन आधारों पर यह सुनिश्चित करेंगे कि अमुक व्यक्ति ‘साधु’ है?
13. मोह और प्रेम में अंतर होता है। भगत के जीवन की किस घटना के आधार पर इस कथन का सच सिद्ध करेंगे?
भाषा-अध्ययन
14. इस पाठ में आए कोई दस क्रियाविशेषण छाँटकर लिखिए और उनके भेद भी बताइए।
पाठेतर सक्रियता
-
पाठ में ऋतुओं के बहुत ही सुंदर शब्द-चित्र उकेरे गए हैं। बदलते हुए मौसम को दर्शाते हुए चित्र/फ़ोटो का संग्रह कर एक अलबम तैयार कीजिए।
-
पाठ में आषाढ़, भादो, माघ आदि में विक्रम संवत कलैंडर के मासों के नाम आए हैं। यह कलैंडर किस माह से आरंभ होता है? महीनों की सूची तैयार कीजिए।
-
कार्तिक के आते ही भगत ‘प्रभाती’ गाया करते थे। प्रभाती प्रातःकाल गाए जाने वाले गीतों को कहते हैं। प्रभाती गायन का संकलन कीजिए और उसकी संगीतमय प्रस्तुति कीजिए।
-
इस पाठ में जो ग्राम्य संस्कृति की झलक मिलती है वह आपके आसपास के वातावरण से कैसे भिन्न है?
शब्द-संपदा
| मँझोला | - न बहुत बड़ा न बहुत छोटा |
| कमली | - कंबल |
| पतोहू | - पुत्रवधू / पुत्र की स्त्री |
| रोपनी | - धान की रोपाई |
| कलेवा | - सवेरे का जलपान |
| पुरवाई | - पूरब की ओर से बहने वाली हवा |
| अधरतिया | - आधी रात |
| खँजड़ी | - ढफली के ढंग का परंतु आकार में उससे छोटा एक वाद्य यंत्र |
| निस्तब्धता | - सन्नाटा |
| लोही | - प्रातःकाल की लालिमा |
| कुहासा | - कोहरा |
| आवृत | - ढका हुआ, आच्छादित |
| कुश | - एक प्रकार की नुकीली घास |
| बोदा | - कम बुद्धि वाला |
| संबल | - सहारा |
यह भी जानें
प्रभातियाँ मुख्य रूप से बच्चों को जगाने के लिए गाई जाती हैं। प्रभाती में सूर्योदय से कुछ समय पूर्व से लेकर कुछ समय बाद तक का वर्णन होता है। प्रभातियों का भावक्षेत्र व्यापक और यथार्थ के अधिक निकट होता है। प्रभातियों या जागरण गीतों में केवल सुकोमल भावनाएँ ही नहीं वरन् वीरता, साहस और उत्साह की बातें भी कही जाती हैं। कुछ कवियों ने प्रभातियों में राष्ट्रीय चेतना और विकास की भावना को पिरोने का प्रयास किया है।
श्री शंभूदयाल सक्सेना द्वारा रचित एक प्रभाती-
पलकें, खोलो, रैन सिरानी।
बाबा चले खेत को हल ले सखियाँ भरतों पानी।।
बहुएँ घर-घर छाछ बिलोतों गातीं गीत मथानी।
चरखे के संग गुन-गुन करती सूत कातती नानी॥
मंगल गाती चील चिरैया आस्मान फहरानी।
रोम-रोम में रमी लाडली जीवन ज्योत सुहानी।।
आलस छोड़ो, उठो न सुखदे! मैं तब मोल बिकानी।।
पलकें खोलो हे कल्याणी।।