अध्याय 11 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

प्रहलाद अग्रवाल
संवत् 1947

भारत की आज़ादी के सालों में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में जन्मे प्रहलाद अग्रवाल ने हिंदी से एम.ए. तक शिक्षा हासिल की। इन्हें किशोर वय से ही हिंदी फिल्मों के इतिहास और फिल्मकारों के जीवन और उनके अभिनय के बारे में विस्तार से जानने और उस पर चर्चा करने का शौक रहा। इन दिनों सतना के शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापन कर रहे प्रहलाद अग्रवाल फिल्म क्षेत्र से जुड़े लोगों और फिल्मों पर बहुत कुछ लिख चुके हैं और आगे भी इसी क्षेत्र को अपने लेखन का विषय बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प हैं। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - सातवाँ दशक, तानाशाह, मैं खुशबू, सुपरस्टार, राजकपूर: आधी हकीकत आधा फसाना, कवि शैलेन्द्र: ज़िंदगी की जीत में यकीन, प्यासा: चार अतृप्त गुरुदत्त, उत्ताल उमंग: सुभाष घई की फिल्मकला, ओ रे माँ झी: बिमल रॉय का सिनेमा और महाबाज़ार के महानायक: इक्कीसवीं सदी का सिनेमा। ### पाठ प्रवेश

साल के किसी भी महीने में शायद ही कोई शुक्रवार ऐसा जाता हो जब कोई न कोई हिंदी फ़िल्म सिने परदे पर न पहुँचती हो। इनमें से कुछ सफल रहती हैं तो कुछ असफल। कुछ दर्शकों को कुछ अरसे तक याद रह जाती हैं, कुछ को वह सिनेमा घर से बाहर निकलते ही भूल जाते हैं। लेकिन जब कोई फ़िल्मकार किसी साहित्यिक कृति को पूरी लगन और ईमानदारी से परदे पर उतारता है तो उसकी फ़िल्म न केवल यादगार बन जाती है बल्कि लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही उन्हें कोई बेहतर संदेश देने में भी कामयाब रहती है। एक गीतकार के रूप में कई दशकों तक फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े रहे कवि और गीतकार ने जब फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कृति ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम’ को सिने परदे पर उतारा तो वह मील का पत्थर सिद्ध हुई। आज भी उसकी गणना हिंदी की कुछ अमर फ़िल्मों में की जाती है। इस फ़िल्म ने न केवल अपने गीत, संगीत, कहानी की बदौलत शोहरत पाई बल्कि इसमें अपने ज़माने के सबसे बड़े शोमैन राजकपूर ने अपने फ़िल्मी जीवन की सबसे बेहतरीन एक्टिंग करके सबको चमत्कृत कर दिया। फ़िल्म की हीरोइन वहीदा रहमान ने भी वैसा ही अभिनय कर दिखाया जैसी उनसे उम्मीद थी।

इस मायने में एक यादगार फ़िल्म होने के बावजूद ‘तीसरी कसम’ को आज भी इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इस फ़िल्म के निर्माण ने यह भी उजागर कर दिया कि हिंदी फ़िल्म जगत में एक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फ़िल्म बनाना कितना कठिन और जोखिम भरा काम है।

‘तीसरी कसम’ की शिल्पकार शैली और ‘संगम’ की अद्भुत सफलता ने राजकपूर में गहन आत्मविश्वास भर दिया और उन्होंने एक साथ चार फ़िल्मों के निर्माण की घोषणा की - ‘मेरा नाम जोकर’, ‘अजंता’, ‘मैं और मेरा दोस्त’ और ‘सत्यं शिवम् सुंदरम्’। पर जब 1965 में राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ का निर्माण आरंभ किया तब संभवतः उन्होंने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि इस फ़िल्म का एक ही भाग बनाने में छह वर्षों का समय लग जाएगा।

इन छह वर्षों के अंतराल में राजकपूर द्वारा अभिनीत कई फिल्में प्रदर्शित हुईं, जिनमें सं 1966 में प्रदर्शित कविशैलेंद्र की ‘तीसरी कसम’ भी शामिल है। यह वह फिल्म है जिसमें राजकपूर ने अपने जीवन की सर्वोत्कृष्ट भूमिका अदा की। यही नहीं, ‘तीसरी कसम’ वह फिल्म है जिसने हिंदी साहित्य की एक अत्यंत मार्मिक कृति को सैल्यूलॉइड पर पूरी सार्थकता से उतारा। ‘तीसरी कसम’ फिल्म नहीं, सैल्यूलॉइड पर लिखी कविता थी। ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम फिल्म है। ‘तीसरी कसम’ को ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ मिला, बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फिल्म और कई अन्य पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया। मॉस्को फिल्म फेस्टिवल में भी यह फिल्म पुरस्कृत हुई। इसकी कलात्मकता की लंबी-चौड़ी तारीफ़ें हुईं। इसमें शैलेंद्र की संवेदनशीलता पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है। उन्होंने ऐसी फिल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।

शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं। राजकपूर ने अपने अनन्य सहयोगी की फिल्म में उतनी ही तन्मयता के साथ काम किया, किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा किए बगैर। शैलेंद्र ने लिखा था कि वे राजकपूर के पास ‘तीसरी कसम’ की कहानी सुनाने पहुँचे तो कहानी सुनकर उन्होंने बड़े उत्साहपूर्वक काम करना स्वीकार कर लिया। परंतु रात गंभीरता पूर्वक बोले - “मेरा पारिश्रमिक एडवांस देना होगा।” शैलेंद्र को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि राजकपूर ज़िंदगी-भर की दोस्ती को यूँ बदल देंगे। शैलेंद्र के मुरझाए हुए चेहरे को देखकर राजकपूर ने मुस्कराते हुए कहा, “निकालो एक रुपया, मेरा पारिश्रमिक! पूरा एडवांस।” शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना-नमस्ती से परिचित तो थे, लेकिन एक निर्माता के रूप में बड़े व्यावसायिक सूझबूझ वाले भी चकित हो जाते हैं, फिर

शैलेंद्र फिल्म-निर्माता बनने के लिए सर्वथा अयोग्य थे। राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हीसियत से शैलेंद्र को फिल्म की असफलताओं के खतरों से आगाह भी किया। पर वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी। ‘तीसरी कसम’ कितनी भी महान फिल्म क्यों न रही हो, लेकिन यह एक दुःखद सत्य है कि इसे प्रदर्शित करने के लिए बमुश्किल वितरक मिले। बावजूद इसके कि ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे नामजद सितारे थे, शंकर-जयकिशन का संगीत था, जिनकी लोकप्रियता उन दिनों सातवें आसमान पर थी और इसके गीत भी फिल्म के प्रदर्शन के पूर्व ही बेहद लोकप्रिय हो चुके थे, लेकिन इस फिल्म को खरीदने वाला कोई नहीं था। दरअसल इस फिल्म की संवेदना की सीमा दो से चार बनाने का गणित जानने वाले की समझ से परे थी। उसमें रची-बसी करुणा तराजू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी। इसी लिए बमुश्किल जब ‘तीसरी कसम’ रिलीज़ हुई तो इसका कोई प्रचार नहीं हुआ। फिल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा।

ऐसा नहीं है कि शैलेन्द्र बीस सालों तक फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से नावाक़िफ़ थे, परंतु उनमें उलझकर वे अपनी आदमियत नहीं खो सके थे। ‘श्री 420’ का एक लोकप्रिय गीत है — ‘प्यार हुआ, इकरार हुआ है, पप्पा से फिर क्यूँ डरता है दिल।’ इसके अंतरे की एक पंक्ति — ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति की। उनका ख़याल था कि दर्शक ‘चार दिशाएँ’ तो समझ सकते हैं — ‘दस दिशाएँ’ नहीं। लेकिन शैलेन्द्र परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हुए। उनका दृढ़ मतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ताओं की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयास करे। और उनका यक़ीन गलत नहीं था। यही नहीं, वे बहुत अच्छे गीत भी जो उन्होंने लिखे बेहद लोकप्रिय हुए। शैलेन्द्र ने झूठे अभिजात्य को कभी नहीं अपनाया। उनके गीत भाव-प्रवण थे — दूरूह नहीं। ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ — यह गीत शैलेन्द्र ही लिख सकते थे। शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई लिए हुए। यही विशेषता उनकी ज़िंदगी की थी और यही उन्होंने अपनी फ़िल्म के द्वारा भी साबित किया था।

‘तीसरी कसम’ यदि एकमात्र नहीं तो चंद उन फिल्मों में से है जिन्होंने साहित्य-रचना के साथ सौ-प्रतिशत न्याय किया है। शैलेन्द्र ने राजकपूर जैसे स्टार को ‘हीरामन’ बना दिया था। हीरामन पर राजकपूर हावी नहीं हो सका। और छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी ‘हीरा बाई’ ने वही दाराहमान की प्रसिद्ध ऊँचाइयों को बहुत पीछे छोड़ दिया था। कजरी नदी के किनारे उकड़ बैठा हीरामन जब गीत गाते हुए होरा बाई से पूछता है ‘मन समझती है न आप?’ तब हरा रायी ज़ुबान से नहीं, आँखों से बोलती है। दुनिया-भर के शब्द उस भाषा को अभिव्यक्त नहीं दे सकते। ऐसी ही सूक्ष्मताओं से स्पंदित थी - ‘तीसरी कसम’। अपनी मस्ती में डूबकर झूमते गाते गाड़ीवान - ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजड़ेवाली मुनिया।’ टप्पर-गाड़ी में हीरा बाई को जाते हुए देखकर उनके पीछे दौड़ते-गाते बच्चों का हुजूम - ‘लाली-लाली डोलिया में लाली रे दुलहिनिया’, एक नौटंकी की किसी बाई में अपना पन खोज लेने वाला सरल हृदय गाड़ीवान! अभावों की ज़िंदगी जीते लोगों के सपने ले-कहके।

हमारी फिल्मों की सबसे बड़ी कमजोरी होती है, लोक-तत्त्व का अभाव। वे ज़िंदगी से दूर होती हैं। यदि त्रासद स्थितियों का चित्राण होता है तो उन्हें ग्लोरिफाई किया जाता है। दुख का ऐसा वीभत्स रूप प्रस्तुत होता है जो दर्शकों का भावनात्मक शोषण कर सके। और ‘तीसरी कसम’ की यह खास बात थी कि वह दुख को भी सहज स्थिति में, जीवन-सापेक्ष प्रस्तुत करती है। मैंने शैलेंद्र को गीतकार नहीं, कवि कहा है। वे सिनेमा की चकाचौंध के बीच रहते हुए यश और धन-लिप्सा से कोसों दूर थे। जो बात उनकी ज़िंदगी में थी वही उनके गीतों में भी। उनके गीतों में सिर्फ करुणा नहीं, जूझने का संकेत भी था और वह प्रक्रिया भी मौजूद थी जिसके तहत अपनी मंज़िल तक पहुँचा जा सकता है। व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है। शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ को अपनी भावप्रवणता का सर्वश्रेष्ठ तथ्य प्रदान किया। मुकेश की आवाज़ में शैलेंद्र का यह गीत तो अद्वितीय बन गया है - सजनवा बैरी हो गए हमार चिट्ठिया हो तो हर कोई बाँचे भाग न बाँचे को य…

अभिनय के दृष्टिकोण से ‘तीसरी कसम’ राजकपूर की ज़िंदगी की सबसे हसीन फ़िल्म है। राजकपूर जिन्हें समीक्षक और कला-प्रेमी आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते हैं, ‘तीसरी कसम’ में मसूमियत के चरमोत्कर्ष को छूते हैं। अभिनेता राजकपूर जितनी ताक़त के साथ ‘तीसरी कसम’ में मौजूद हैं, उतना ‘जागते रहो’ में भी नहीं। ‘जागते रहो’ में राजकपूर के अभिनय को बहुत सराहा गया था, लेकिन ‘तीसरी कसम’ वह फ़िल्म है जिसमें राजकपूर अभिनय नहीं करते। वह हीरामन के साथ एकाकार हो गए हैं। खालिस देहाती भोच्ची गाड़ीवान जो सिर्फ़ दिल की ज़ुबान समझता है, दिमाग की नहीं। जिसके लिए मोहब्बत के सिवा किसी दूसरी चीज़ का कोई अर्थ नहीं। बहुत बड़ी बात यह है कि ‘तीसरी कसम’ राजकपूर के अभिनय-जीवन का वह मुकाम है, जब वह एशिया के सबसे बड़े शोमैन के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनका अपना व्यक्तित्व एक किंवदंती बन चुका था। लेकिन ‘तीसरी कसम’ में वह महिमामय व्यक्तित्व पूरी तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है। वह कहीं हीरामन का अभिनय नहीं करते, अपितु खुद ही हीरामन में ढल गए हैं। हीराबाई की फेनू-गिलासी बोली पर रीझता हुआ, उसकी ‘मनुआ-नटुआ’ जैसी भोली सूरत पर न्योछावर

होता हुआ और हीराबाई की तकनीक-सी उपेक्षा पर अपने अस्तित्व से जूझता हुआ सच्चा ही राम बन गया है। ‘तीसरी कसम’ की पटकथा मूल कहानी के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं तैयार की थी। कहानीकार के शब्द-शब्द, उसकी छोटी-से-छोटी बारीकियाँ फ़िल्म में पूरी तरह उतर आईं।

प्रश्न-अभ्यास

मौखिक
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए -

  1. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?
  2. शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाईं?
  3. राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम बताइए।
  4. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?
  5. फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किसने किया था?
  6. राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?
  7. राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया?
  8. फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?

लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए -

1. फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ को ‘सेल्यूलॉइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा गया है?

2. फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?

3. शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है?

4. फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफाई क्यों कर दिया जाता है?

5. ‘शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं’ - इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

6. लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं?

7. फ़िल्म ‘श्री 420’ के गीत ‘रातों दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति क्यों की?

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए:

1. राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई?

2. ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए।

3. लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘तीसरी कसम’ ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?

४. शैलेन्द्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
५. फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेन्द्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
६. शैलेन्द्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्मों में झलकती है — कैसे? स्पष्ट कीजिए।
७. लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।

(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए —
१. वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।
२. उनका यह दृढ़ मत था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।
३. व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।
४. दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो-से-चार बनाने वाले की समझ से परे है।
५. उनके गीत भाव-प्रवण थे — दुरूह नहीं।

1. पाठ में आए ‘से’ के विभिन्न प्रयोगों से वाक्य की संरचना को समझिए।
(क) राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हीसियत से शैलेंद्र को फिल्म की असफलता के खतरों से आगे भी किया।
(ख) रातें दिशाओं से कहती अपनी कहानियाँ।
(ग) फिल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से वह नावाकिफ थे।
(घ) दरअसल इस फिल्म की संवेदना किसी दो-चार बनाने के गणित को जानने वाले की समझ से परे थी।
(ङ) शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना से दोस्ती से परिचित तो थे।

2. इस पाठ में आए निम्नलिखित वाक्यों की संरचना पर ध्यान दीजिए -
(क) ‘तीसरी कसम’ फिल्म नहीं, सैल्यूलॉइड पर लिखी कविता थी।
(ख) उन्होंने ऐसी फिल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।
(ग) फिल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा।
(घ) खालिस देहाती भुच्च गाड़ी वान जो सिर्फ दिल्ली की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं।

3. पाठ में आए निम्नलिखित मुहावरों से वाक्य बनाइए -
चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो-चार बनाना, आँखों से बोलना

4. निम्नलिखित शब्दों के हिंदी पर्याय दीजिए -
(क) शिद्दत _____________
(ङ) नावाकिफ _____________
(ख) याराना _____________
(च) यकीन _____________
(ग) बमुश्किल _____________
(छ) हावी _____________
(घ) खालिस _____________
(ज) रेशा _____________

5. निम्नलिखित कासंधि का विच्छेद कीजिए -
(क) चित्रांकन _____________ + _____________
(ख) सर्वोत्कृष्ट _____________ + _____________
(ग) चर्मोत्कर्ष _____________ + _____________
(घ) रूपांतरण _____________ + _____________
(ङ) घनानंद _____________ + _____________

6. निम्नलिखित का समास विग्रह कीजिए और समास का नाम भी लिखिए -
(क) कलामर्मज्ञ __________________
(ख) लोकप्रिय __________________
(ग) राष्ट्रपति __________________

योग्यता विस्तार

1. फणीश्वरनाथ रेणु की किस कहानी पर ‘तीसरी कसम’ फिल्म आधारित है, जानकारी प्राप्त कीजिए और मूल रचना पढ़िए।

2. समाचार पत्रों में फ़िल्मों की समीक्षा दी जाती है। किन्हीं तीन फ़िल्मों की समीक्षा पढ़िए और ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को देखकर इस फ़िल्म की समीक्षा स्वयं लिखने का प्रयास कीजिए।

परियोजना कार्य

1. फ़िल्मों के संदर्भ में आपने अक्सर यह सुना होगा - ‘जो बात पहले की फ़िल्मों में थी, वह अब कहाँ।’ वर्तमान दौर की फ़िल्मों और पहले की फ़िल्मों में क्या समानता और अंतर है? कक्षा में चर्चा कीजिए।

2. ‘तीसरी कसम’ जैसी और भी फ़िल्में हैं जो किसी न किसी भाषा की साहित्यिक रचना पर बनी हैं। ऐसी फ़िल्मों की सूची नीचे दिए गए प्रपत्र के आधार पर तैयार कीजिए।

क्र. सं. फ़िल्म का नाम साहित्यिक रचना भाषा रचनाकार
1. देवदास देवदास बांग्ला शरत्चंद्र
2. _______ _______ _______ _______
3. _______ _______ _______ _______
4. _______ _______ _______ _______

3. लोकगीत हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। ‘तीसरी कसम’ फिल्म में लोकगीतों का प्रयोग किया गया है। आप भी अपने क्षेत्र के प्रचलित दो-तीन लोकगीतों को एकत्र कर परियोजना कॉपी पर लिखिए।

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

अंतराल - के बाद
अभिनीत - अभिनय किया गया
सर्वोत्कृष्ट - सबसे अच्छा
सेल्यूलॉइड - कैमरे की रील में उतारा गया चित्र प्रस्तुत करना
सार्थकता - सफलता के साथ
कलात्मकता - कला से परिपूर्ण
संवेदनशीलता - भावुकता
शिद्दत - तीव्रता
अनन्य - परम/अत्यधिक
तन्मयता - तल्लीनता
पारिश्रमिक - मेहनताना
याराना मस्ती - दोस्तों का अंदाज़
आगाह - सचेत
आत्म-संतुष्टि - अपनी तुष्टि
बमुश्किल - बहुत कठिनाई से
वितरक - प्रसारित करने वाले लोग
नामज़द - विख्यात
नावाकिफ़ - अनजान
इकरार - सहमति
मंतव्य - इच्छा
उथलापन - सतही/नीचा
अभिजात्य - परिष्कृत
भाव-प्रवण - भावनाओं से भरा हुआ
दुरूह - कठिन
उकडू - घुटनों मोड़कर पैरों के तलवों के सहारे बैठना
सूक्ष्मता - बारीकी
स्पंदित - संचालित करना/गतिमान
लालायित - इच्छुक
टप्पर-गाड़ी - अर्धगोलाकार छप्पर युक्त बैलगाड़ी
हुजूम - भीड़
प्रतिरूप - छाया
रूपांतरण - किसी एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करना
लोक-तत्त्व - लोकसंबंधी
त्रासद - दुखद
ग्लोरीफाई - गुणगान/महिमा रूपांकित करना
वीभत्स - भयावह
जीवन-सापेक्ष - जीवन के प्रति
धन-लिप्सा - धन की अत्यधिक चाह
प्रक्रिया - प्रणाली
बाँचना - पढ़ना
भाग - भाग्य
भरमाना - भ्रम होना/झूठा आश्वासन
समीक्षक - समीक्षा करने वाला
कला-मर्मज्ञ - कला की परख करने वाला
चर्मोत्कर्ष - ऊँचाई के शिखर पर
खालिस - शुद्ध
भुच्च - निरा/बिल्कुल
किंवदंती - कहावत